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Wednesday, 7 February 2018

जानिए मोदी की काली करतूत

मलिकार मोदी जी!
सादर प्रणाम। 
आज पहली बार देश के प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख रहा हूँ... रोआँ - रोआँ गदगद हो गया है खुशी और गौरव से।
मैं बिना किसी भूमिका के अपनी बात रखूँगा।
मलिकार!
आप जानते हैं कि देश में तत्काल साढ़े चार लाख सिपाही की आवश्यकता है?
आप जानते हैं कि इन्कम टैक्स विभाग में बत्तीस हज़ार से अधिक पद रिक्त हैं?
आप जानते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं में बहत्तर हजार से अधिक चिकित्सक अभी चाहिए?
आप जानते हैं कि भारत में यह पोस्ट लिखते समय दस लाख अध्यापक के पद रिक्त हैं?
आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड ने दस साल में मात्र एक भर्ती क्लीयर (कुछ मामले अभी भी कोर्ट में) की है?
नहीं पता है आपको। लेकिन हम युवाओं को बखूबी पता है कि कैसे किसी भी राज्य सरकार की भर्ती में दस पांच सवाल जानबूझकर कर ग़लत पूछे जाते हैं ताकि एक भर्ती तीन साल तक चले। क्योंकि आपकी नीयत ठीक नहीं।क्योंकि कोई भी राज्य सरकारें चाहतीं ही नहीं कि नौकरी दी जाए क्योंकि संसद में बैठने वाले हत्यारोपियों बलात्कारियों और घोटालेबाजों के ऐश करने के लिए बजट कहाँ से आएगा?
मलिकार! कक्षा एक से एम ए, बीएड् तक सतत प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने के बाद भी विदेश के नाम पर नेपाल गया हूँ और वहाँ भी ललकार कर कह आया कि मैंने अपना प्रधानमंत्री उसे चुना है जिसने चाय बेची है देश नहीं बेचा...। 
अब वो अलग बात है कि छह सौ करोड़ देशवासियों माफ़ कीजिये सवा सौ करोड़ देशवासियों में कोई सामने नहीं आया जिसे आपने चाय दी थी। फिर भी मुझे खुशी है कि एक जमीन से जुड़ा व्यक्ति हमारा मलिकार है। 
लेकिन अब आप प्रधानमंत्री बन जाने के बाद चाय बेचते तो मुझे शर्म आती कि मेरा प्रधानमंत्री चाय बेचता है।
क्यों? 
क्योंकि एक प्रधानमंत्री का प्रोटोकॉल ग़वाही नहीं देता कि वो सड़क के किनारे खड़े होकर पकौड़े बेचे। 
ठीक इसी तरह समझिए अगर अंगूठा छाप पकौड़े बेचता है तो खुशी है कि वो स्वरोजगार कर रहा है। लेकिन अगर कोई पोस्ट ग्रेजुएट पकौड़े बेच रहा है तो उसके प्रिंसिपल को, उसके कुलपति को, उसके शिक्षा मंत्री को, उसके प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को बीस जूते लगाकर बताना चाहिए कि भारत गणराज्य का एक पोस्ट ग्रेजुएट पकौड़े बेच रहा है तो उसे स्वरोजगार नहीं 'राष्ट्रीय शर्म' कहते हैं। क्योंकि किसी भी विश्वविद्यालय के पोस्ट ग्रेजुएट का प्रोटोकॉल ग़वाही नहीं देता कि वो सड़क के किनारे खड़े होकर पकौड़े बेचे।इसलिए उस दिन "अखण्ड भारत" का झंडा झुक जाना चाहिए, क्योंकि एक पोस्ट ग्रेजुएट या एक प्रधानमंत्री पकौड़े बेचते पाया गया... हाँ मलिकार! आपका यह सवाल स्वरोजगार नहीं राष्ट्रीय शर्म है।।  अगले चुनाव के बाद फिर से चाय बेचना  पड़ेगा तो जरूर बताईयेगा कि ये स्वरोजगार है

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